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Friday, January 27, 2012

लंबी कहानी

मेमना
हिंदी के प्रमुख कहानीकार श्री लोकबाबु द्वारा लिखित एक कहानी है-मेमना। इस कहानी का नायक एक किसान है। मुसरा उसका अपना गाँव था । वहाँ उन्हें पाँच एकड़ ज़मीन थी। एक दिन वह खेती
केलिए अच्छे चीज़ो की तलाश में अपने मंझला भाई के पास गया। लेकिन बीज नहीं मिले उलटे भाई
ने एक मेमना उठाकर उसे पालने पोसने केलिए सौंप दिया ।
किसान मेमने को साथ लेकर गाँव जाने केलिए रेलवे स्टेशन की ओर चला । रास्ते में उसके गाँव मुसरा के एक किसान से मिला । उसने अपनेलिए टिकट और गाड़ी में यदि मिल सके तो जगह रखने केलिए
किसान से कहा था । इसलिए उन्होने दो टिकट लिये थे ।
रेलगाड़ी में बड़ी भीड़ थी। द्वितीय श्रेणी के गंदे और बदबुदार डिब्बे में किसान को थोड़ी सी जगह मिली।
उस डिब्बे में उजले कपड़े पहने अफसरनुमा स्वभाव वाले कुछ नौजवान लड़के बिना टिकट बैठे हुए थे।
उन्होने अपनी उपस्थिति ,हावभाव और बोलचाल से पूरे डिब्बे में आतंक -सा मचा रहा था।
रेलगाड़ी में भीड़ अधिक होने लगी। भीड़ से घबराकर मिमियाते मेमने की फिक्र और डिब्बे के मध्य ,
जहाँ वे लड़के बैठे थे , खड़े होने की जगह देखकर किसान वहाँ चला आया । किसान का वहाँ आना लड़को
को पसंद न आया । लड़को ने घृणा का भाव प्रकट करते हुए किसान को तंग करने लगा। लेकिन
किसान खेतो में बोने केलिए बीज-धान की सोच में पड़ गया ।
तभी ऊपर की सीट पर बैठा एक लड़का खायी हुई फल्ली के छिलके नीचे बैठे दूसरे यात्रियो पर जान बूझकर गिराता हुआ उतरा और उसके बदले दूसरा लड़का ऊपर की सीट पर चढ़गया ।उसके जूते की धूल
नीचे बैठे यात्रियो के सिर पर गिरी, मगर वे चुप रह गए ।उन्होने सोचा कि इन बदमाशो से लड़ना अपनी
पोसिष़न खराब करनी हे।गाड़ी चलती रही। उन लड़को में से एक ने जेब से कीमती सिगरेट का पैकट निकाला और सभी लड़को को बाँट देने के बाद माचिस के लिए हाथ डाला । उसकी माचिस की डिबिया
में दो तीलियाँ था,जो उसकी असावधानी से बिना सिगरेट सुलगे नष्ट हो गई।उन्होने डिब्बे के दोनो छोर की ओर देखकर पूछा- "अरे किसी के पास माचिस है क्या ?” कहीं से जवाब नहीं आया । कुछ यात्रियो के पास
माचिस थी , मगर देने की इच्छा किसी की नही थी। तुम्हारे पास है लड़के ने किसान से पूछा तो उन्होने
जेब से माचिस की डिबिया पकड़कर अपनी जेब में रख ली।सारे लड़के एक दूसरे की ओर देखकर ठहाका
मारकर हंस पड़े। सब मिलकर किसान की मजाक उठाने लगे। किसान ने विवश होकर सबको जवाब दिया।डिब्बे में शेष सभी यात्रीयो का ध्यान किसान की ओर था।
गाड़ी चलती रही। किसान का अपना स्टेशन मुसरा आनेवाला था। वह दरवाज़े की ओर सरक रहा था। तब एक विचित्र घटना घट गई। ऊपर की सीट में बैठे एक लड़के ने अपनी जली हुई सिगरेट किसान के हाथ में लटकते हुए मेमने के सिर में दबाकर बुझा दी।मेमना चिहुक कर मिमियाने लगा। दूसरे लड़के ने किसान की पगड़ी में ही सिगरेट दबा दी। किसान ने मेमने को नीचे रखा और ऊपर की सीट में बैठे लड़के की कालर पकड़कर ज़मीन पर खींच लिया । वह नीचे की सीट में बैठे लड़को के पावो पर गिरा और तीनो
कराहने लगे। किसान ने ऊपर बैठे मोटे लड़के के गाल पर झपट मारा तो दो लड़के के गाल पर झपट
मारा तो दो लड़के के गाल पर झपट किसान पर झपटे, मगर किसान अपने हाथो से रोक लिया।सब लड़के घबराए-से अपनी सीट पर सिमट गए।इस घटना के कारण उस डिब्बे के यात्रियो के मन में उस किसान के प्रति सम्मान और अपनापे की भावना भर आई और डिब्बे में आतंक और उत्पात का वातावरण समाप्त हो गया।मुसरा रेलवे स्टेशन आ गया।किसान बड़ी सरलता से नीचे उतर आया ।मेमने को कंधे पर उठाए वह घर की ओर चला।

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गौरा रेखाचित्र की मुख्य घटनाओं का क्रमबद्ध उल्लेख करें।
• महादेवीजी अपनी छोटी बहन श्यामा के घर से बछिया लाई।
• परिचायक और परिवारवाले उसे बहूत प्यार करते थे।
• उसका नाम रखा गौरा।
• वह अन्य जीव-जंतुओं से हिल मिल गयी।
• पैर की आहट से वह सबको पहचानती थी।
• एक वर्ष के बाद वह माँ बन गयी।
• दुग्ध-दोहन के समय सभी जीव-जंतु उसके आस-पास बैठते थे।
• दुग्ध-दोहन वहाँ के ग्वाले ने किया।
• कुछ मास के बाद वह दुबली-पतली हो गयी।
• डाक्टरों ने निर्णय किया कि उसके ह्रदय के अंदर एक सूई चुभी हुई है,
इसलिए रक्त संचार रुक गया है।
• वह मरणासन्न स्थिति में थी ।
• ग्वाले ने स्वार्थवश गुड़ के अंदर सुई रखकर गौरा को खिलाया था।
• पता चलते ही ग्वाला अतर्धान हो गया।
• सूई न चुभने के लिए उसको सेब का रस दिया।
• इंजक्शन भी दिया।
• महादेविजी को देखते ही उसकी आँखों में प्रसन्नता आती थी।
• अंत में एक दिन बड़े सबेरे चार बजे महादेवीजी के कंधे पर मुख रखकर वह
मर गई।
• उसका पार्थिव अवशेष गंगा में समर्पित किया।
महादेवी वर्मा की डायरी

18-7-2011
आज के समान एक बुरा दिन फिर कभी न आए।गौरा मुझसे विदा लेकर चली गयी।कितनी मार्मिक थी आज उसकी नज़र। मैं अपना दुख सह नहीं सकती।उसकी आँखों का दैन्य मेरी आँखों के सामने अब भी है।श्यामा के घर से गौरा को यहाँ लाते वक्त कितनी खुशी थी यहाँ।सब उन्हें देखने और छूने-चूमने केलिए उत्सुक थे।उस दिन की आरति की चमक सदा उसके चेहरे पर थी।
मेरे घर के सब जीवों को वह बहूत प्यार करती थी।मुझे देखते ही सहलाने के लिए गर्दन बढ़ा देने का दृश्य याद आते वक्त मैं आँसुरोक न सकती ।लालमणी पैदा होने के बाद अपना दूध वह खुशी से सभी को देती थी।सब जीव उसे भी प्यार करते थे।गौरा जैसे बेचारे जीवों से ऎसा क्रूर व्यवहार उसने क्यों और कैसे किया ?ग्वाला ने स्वार्थतावश गौरा को मारा।गौरा का दुर्बल रूप देखकर मैं बहूत चिंतित थी।डाक्टरों ने उसके अंदर की सूई के बारे में बताते वक्त मैं सिहर
उठी।क्या वह ग्वाला उतना क्रूर था ?
फिर मोटे सिरिंज से इंजक्शन ,दवाएँ ,अंदर से सूई की चुभन आदि से परेशान होकर ही है बेचारा गौरा की मौत।अंत के समय लालमणी को चाटने की शक्ति भी उसमें नहीं थी।केवल दर्दभरी दृष्टि से सबों को देख-देखकर समाप्त हो गयी।आज ब्रह्ममुहूर्त में मैं उसके पास बैठे वक्त गौरा की आत्मा मुझे छोड़कर
स्वर्ग चली गयी।इतना समय रोने पर भी उसके अभाव का दुख मुझसे नहीं जाता ।मैं क्या करूँ ? आज का दिन मैं कैसे भूलूँ ? नहीं गौरा , मैं तुझे सदा याद करूँगी ।
नदी की आत्मकथा
मैं अपने पिता पवित्र हिमालय का प्यार पाकर पली थी। तब मैं कितनी खुशी में थी। बड़ी मजबूत ,ओज -भरी नदी थी।कल-कल करके बहकर आते वक्त राह में खड़े पेड़ पौधों से बातें करके और छोटी पहाड़ियों से बातें करके और छोटी पहाड़ियों से दोस्ती करके आती थी।वह मेरे जीवन का वसंतकाल था।मेरे जल में कई तरह की मछलियाँ थी।उनका तैरना मैं आनंद से देखती थी।बाघों का खेल ,कछुओं के पीठ से उलीचा जाना हाथियों की जलक्रीड़ा आदि मैं खुशी के साथ सहती थी।लोग अपने खेतों की सिंचाई और घर की उपयोगिता केलिए मेरा जल लेते थे ।ये सब मैं पसंद करती थी क्योंकि तब मैं उतनी स्वच्छ थी।
काल बदलने के अनुसार मेरा रूप भी बदल गया ।इसका उत्तरदायी मैं नहीं।मुझे प्यार करनेवाले लोगों ने ही मुझे गंदा करना शुरू किया ।नहाना,जानवरों को नहलाना ,कूड़ा कचरा डालना आदि से उन्होंने दुबली और गंदी हो गयी।कारखानों से लाभ उठानेवाले लोग वहाँ के अवशेष मुझ में डालते हैं। तब से मैं काली बन गयी लोगों का यह काम भी मैं मौनरूप से सहती हुँ।
मेरा दुख यह है कि स्वच्छता की बात मैं एक साबुन की टिकिया के पीछे है।क्यों ये लोग मुझ से ऎसा व्यवहार करते हैं ? क्या मैं उनका साथी नहीं हुँ ? मेरा विश्वास है कि जल्द ही जल्दवे मेरी सुरक्षा का उपाय ढूँढेंगे ।
നദിയും സോപ്പു്കഷണവും
( ജ്ഞാനേന്ദ്രപതിയുടെ "നദി ഔര്‍ സാബുന്‍ "എന്ന കവിതയുടെ
സ്വതന്ത്ര പരിഭാഷ )

നദി നീ ഇത്ര മെലിഞ്ഞിരിക്കുന്നതെങ്ങനെ ?
മലിനവും വൃത്തികെട്ടവളുമായി
മൃതസ്വപ്നങ്ങള്‍ കണക്കെ മത്സ്യങ്ങള്‍
പൊങ്ങികിടക്കുന്നതെന്ത് ?
നിന്റെ ദുര്‍ദിനങ്ങളിലെ കെട്ടവെള്ളത്തില്‍
നിന്റെ നീരൂറ്റിയപഹരിച്ചതാര്?
കളകളാരവത്തില്‍ കാളിമ തീര്‍ത്തതാര്?
കടുവകള്‍ തിമിര്‍ത്താടിയിട്ടു
കെട്ടുപോയിട്ടില്ലൊരിക്കലും
ആമകളുടെ കടുത്ത പുറന്തോടില്‍
തട്ടിതെറിച്ചിട്ടും
ആന നീരാട്ടും സഹിച്ചു നീ സാനന്ദം
ആഹാ.. പക്ഷേ
സ്വാര്‍ത്ഥ പണിശാലകളുടെ അമ്ള വിസര്‍ജ്യം സഹിച്ച്
നീലിമ പടര്‍ന്നു നിന്‍ ശുഭ്ര മേനിയില്‍
തലയ്ക്കല്‍ ഹിമവാനൊരുത്തനുണ്ടായിട്ടും
കൈവെള്ളയിലൊതുങ്ങുന്ന സോപ്പുകഷ്ണത്തോട്
തോറ്റുപോയല്ലോ നീ യുദ്ധം ...
जैनी की डायरी








आज कैसा दिन था.....। सबेरे से ही बारिश थी।दूपहर से घनघोर वर्षा…..फिर भी वे गए..।मैं ने कितनी बार कहा उनसे-आज मत जाना.. पर वे नहीं माने..।बच्चों के लिए गए।ओह..तूफ़ानों का गर्जन..........
वे गहरे समुद्र में …..
मौसम अच्छा नहीं।यह समझकर वे जल्दी ही लौटें।
कल इन बच्चों को क्या खिलाऊँ ? उनके लिए कुछ बाजरा बाकी है।एक दिन ज़रूर उनको भी गेहुँ की रोटी दूँ।
तब वे कितने खुश होंगे ?
इन नादान बच्चों केलिए ही वे इतनी कठिनाइयाँ सहते हैं।
हे भगवान ! वे गहराई में न हो।उनके प्राणों की रक्षा कीजिए
मेरी प्रार्थना स्वीकार करें।
सकुबाई से सफाई घर की भी, दिल की भी
नाटक में आप जितने भी प्रयोग कर लें, पीरियड ड्रामा ले आएं, ड्रामे के माध्यम से आप राग रंग, नट भाव, उपमा, उपमान की बातें बताएं, सच तो यह है कि आम आदमी नाटक के उन्हीं हिस्सों से जुड़ पाता है, जिसके साथ वह अपना जीवन देख पाता है। पौराणिक आख्यानों में भी वह वहीं तक पहुंचता है, जहां उसे आज का अपना समाज, परिवेश दिखाई देता है। ऐसे में सामजिक या यों कहें कि घरेलू पृष्ठभूमि पर खेले गये नाटक से दर्शक तुरंत अपना नाता जोड़ लेते हैं। एकजुट थिएटर ग्रुप प्रस्तुत नादिरा ज़हीर बब्बर लिखित व निर्देशित नाटक “सकुबाई” नाटक एक ऐसी ही रचना है, जिसमें घर-घर काम करनेवाली बाई सकुबाई के माध्यम से समाज में एक साथ ही जी रहे नाना वर्गों के नाना जीवन को देखे जाने की कोशिश है। साथ ही साथ खुद उसके अपने जीवन की भी। एक आम मध्य या उच्च वर्ग और तथाकथित निम्न वर्ग में कोई फर्क़ नहीं रह जाता, जब मामला प्रेम, सेक्स, घरेलू हिंसा, बलात्कार, आपसी जलन आदि पर आता है, बल्कि कई बार तो ये तथाकथित निम्न वर्ग के लोग इन संभ्रांत लोगों पर भारी पड़ जाते हैं। क्या फर्क़ रह जाता है सकुबाई या उसकी मालकिन में कि दोनों के ही पति के विवाहेतर संबंध हैं। विरोध करने पर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर मालकिन भी पति के हाथों बुरी तरह पिटती है, मगर बच्चों की खातिर घर नहीं छोड़ पाती। मगर, फर्क़ है। सकुबाई के पति के संबंध जग जाहिर हैं। मालकिन के पति के संबंध सामाजिकता की खोल में छुपा। नौकरानी हो कर भी सकुबाई इतनी ईमानदार है कि मालकिन अपना पूरा घर उसके ऊपर छोड़ देती है, जबकि उसी मालकिन की करोड़पति सहेली मालकिन के पर्स से उसके हीरे की अंगूठी चुरा लेती है। मुंबई में आपको ऐसी ईमानदार बाइयों की फौज़ मिलेगी। बल्कि यूं कहें कि जिस तरह हर सफल पुरुष के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है, उसी तरह हर सफल औरत के पीछे उसकी बाई का हाथ होता है।
एकपात्रीय नाटक को कुशलतापूर्वक डेढ़ घंटे तक खींच ले जाना किसी समर्थ कलाकार की ही खासियत है और यह विशेषता निस्संदेह सकुबाई की भूमिका में सरिता जोशी की है। सरिता जोशी गुजराती थिएटर और फिल्म की मशहूर और बड़ी कुशल, इसलिए सफल अभिनेत्री हैं। वे लगभग 45 सालों से भी अधिक समय से अभिनय के क्षेत्र में हैं। एकपात्रीय अभिनय में सब कुछ उसी पात्र को दर्शाना होता है और सरिता जोशी ने मालिक से लेकर अपने पति और बूढ़ी मां की भी भूमिका बड़ी कुशलता से निभायी है। तदनुसार आवाज़, शारीरिक भंगिमा, चेहरे पर भाव। हालांकि उम्र अपनी छाप उन पर छोड़ने लगी है। बीच-बीच में वे हांफ जाती रहीं, संवाद भी लगा कि कुछ भूलती सी रहीं। मगर यह उनकी नाट्यकुशलता ही थी कि इसे उन्होंने ज़ाहिर नहीं होने दिया।
यह नाटक 1999 में पृथ्वी फेस्टिवल में ओपन हुआ था। तब से इस नाटक के कई शो हो चुके हैं। नादिरा बब्बर के यह भी पुराने नाटकों मे से एक है, जिसमें उनकी पुरानी मेहनत व प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती है। सेट प्रभार, स्टेज और प्रोडक्शन सभी में हनीफ पटनी ने अपनी कुशलता दिखायी है। फिर भी, नाटक के दस साल हो जाने के कारण सेट अब पुराने हो चुके हैं, जो स्टेज पर भी दिखते हैं। प्रकाश व्यवस्था नाटक के अनुरूप थी और संगीत संचालन एक्टर को अभिनय के साथ-साथ डांस करने व अन्य हाव-भाव के लिए पर्याप्त स्पेस देता है। “दयाशंकर की डायरी” की तरह ही यह नाटक आपको अपने से जोड़ कर रखता है, बल्कि कुछ अधिक ही, क्योंकि आखिरकार यह एक महिला की लिखी, महिला की ज़ुबानी, महिला की गाथा है, और महिला की कहानी में प्रताड़णा के भाव तनिक अधिक तो रहते ही हैं, जिसमें व्यक्ति और परिवेश दोनों की ही भूमिका रहती है। इसलिए यह नाटक हो सकता है आपको “दयाशंकर की डायरी” से अधिक अपील करे, जैसा कि इसने यहां के दर्शकों को किया था।